Thursday, 8 September 2016

"दि हिरोइन ऑफ दि हाईजैक"

                                                              "दि हिरोइन ऑफ दि हाईजैक

                                                                   

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नीरजा भनोट 
             मित्रों नमस्कार आज मैं "अंकित त्रिपाठी" आप सब के समक्ष एक ऐसी साहसी और बहादुर लड़की की सच्ची घटना बताने जा रहा हूँ जिसने अपने अदम्य साहस और बहादुरी  से न केवल कई यात्रियों की जान बचाई अपितु समस्त देशवासियों को एक सीख प्रदान की और जिसने समस्त विश्व में भारत का नाम रोशन किया  जिसने अपनी जान की परवाह ना करते हुए 376 यात्रियों की जान बचाई। 

जी हां मित्रों आज मैं अंकित त्रिपाठी आप सब के समक्ष एक ऐसी सच्ची घटना प्रस्तुत करने जा रहा हूँ जिसे पढ़ कर आप सब की आँखे नम हो जाएंगी। मित्रों यह घटना 5 सितम्बर 1986 की है जब मुम्बई से अमेरिका जाने वाली "पैन एम 73 फ्लाइट" जिसे पाकिस्तान के करांची एअरपोर्ट पर अपहरण कर लिया गया था। उस समय विमान में 376 यात्री और 19 क्रू सदस्य थे। मित्रों यह घटना उस लड़की की है जो उसी विमान की सीनियर परिचालिका थीं जिसका नाम आज पूरा विश्व गर्व से लेता है और वह लड़की कोई और नहीं अपितु "नीरजा भनोट " थीं। 

उनका जन्म चण्डीगढ़ में हुआ था। वह रमा भनोट और हरीश भनोट की बेटी थी। नीरजा का विवाह वर्ष 1985 में संम्पन्न हुआ और अपने पति के साथ खाड़ी देश को चली गई लेकिन कुछ दिनों बाद दहेज़ के दबाव को ले कर इस रिश्ते में खटास आ गई और विवाह के दो महीने बाद नीरजा वापस मुम्बई आ गई। मुम्बई आने के बाद उन्होंने पैन एम 73 में विमान परिचालिका की नौकरी के लिए आवेदन किया और चुने जाने के बाद मियामी में ट्रेनिंग के बाद वापस लौटीं, और अपनी नौकरी पूरी ईमानदारी से करने लगीं। 

मित्रों आतंकवादी जिन्होंने विमान का अपहरण किया था वो जेल में कैद उनके सदस्यों को रिहा कराना चाहते थे। जैसे ही आतंकवादियों ने विमान का अपहरण किया वैसे ही नीरजा ने इसकी सूचना चालक स्थान पर बैठे कर्मचारी को दे दी एअरक्राफ्ट के बाकी सभी सदस्य चाहते थे की अब विमान अपनी जगह से किसी भी हालत में ना उड़े। उन सब में नीरजा ही सबसे सीनियर परिचालिका थीं इसलिए नीरजा ने ही उसे अपने हाथों में लिया। जब विमान का अपहरण हुआ तब वह विमान के अपहरण होने की जानकारी चालक स्थान पर बैठे कर्मचारी तक पहुँचाना चाहती थीं किन्तु उन्हें रोक दिया गया लेकिन फिर भी उन्होंने कोड की भाषा में अपनी बातों को कर्मचारियों तक पहुंचाया, जैसे ही विमान चालक तक नीरजा की बात पहुंची तो उस विमान के पायलेट, सह-पायलेट और फ्लाइट इंजीनियर विमान को वही छोड़ कर भाग गए। फिर उन आतंकवादियों ने नीरजा से सभी यात्रियों के पासपोर्ट इकट्ठे करने को कहा ताकि उनमे से वो अमेरिकन्स को पहचान सकें। उन आतंकवादियों का मुख्य लक्ष्य अमेरिकी यात्रियों को मारना था, इसलिए नीरजा ने बड़ी सूझ-बूझ के साथ 41 अमेरिकन्स के पासपोर्ट छिपा दिए जिनमे से कुछ उन्होंने सीट के नीचे और कुछ ढलान वाली जगह पर छुपा दिए। 

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मित्रों उस विमान में बैठे 41 अमेरिकियों में से सिर्फ दो को ही आतंकवादी मारने में सफल हुए। फिर आतंकवादियों ने पाकिस्तानी सरकार से विमान में पायलेट भेजने को कहा, परन्तु पाकिस्तानी सरकार ने मना कर दिया। फिर आतंकवादियों ने एक ब्रिटिश नागरिक को विमान के द्वार पर ला कर पाकिस्तानी सरकार को धमकी दी कि यदि वो पायलेट नहीं भेजेंगे तो वो उसे मार देंगे तभी नीरजा ने आतंकवादियों से से बात कर उस ब्रिटिश नागरिक को बचा लिया। 
मित्रों यहीं से पता चलता है कि नीरजा कितनी साहसी, बहादुर और सूझ-बूझ वाली महिला थीं। इसके पश्चात कुछ घण्टों बाद उस विमान फ्यूल समाप्त हो गया और विमान में अंधेरा हो गया जिसके कारण अपहरणकर्ताओं ने अँधेरे में ही गोलीबारी शुरू कर दी। तभी अँधेरे का फायदा उठाते हुए नीरजा ने अपातकालीन द्वार खोलकर यात्रियों को बाहर निकालने की कोशिश की। नीरजा ने जब द्वार खोला तब वो चाहती तो पहले स्वयं को बचा सकती थी, परन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया और सभी यात्रियों को बाहर निकालने के बाद बचे हुए तीन बच्चों को बचाते हुए नीरजा उन आतंकवादियों की गोली शिकार हो गई जिसके कारण उनकी मृत्यु हो गई। 

मित्रों उनमे से एक बच्चा जो उस समय महज 7 साल का था वह नीरजा भनोट की बहादुरी से प्रभावित होकर एयरलाइन्स में कैप्टन बना। मित्रों महज 23 साल की उम्र में इतनी बहादुरी और साहस से नीरजा ने सभी यात्रियों की जान बचाई थी। 
Image result for ashok chakra                                  मित्रों "अपने जन्मदिन के दो दिन पहले शहीद होने वाली भारत के की इस बहादुर बेटी पर ना सिर्फ भारत अपितु पाकिस्तान और अमेरिका भी रोया था" क्योंकि उन्होंने कई अमेरिकी और पाकिस्तानी लोगों  की जान बचाई थी। नीरजा भनोट को "दि हिरोइन ऑफ दि हाईजैक" के नाम से पुकारा जाता है। नीरजा भनोट मरणोपरांत अशोक चक्र पाने वाली सबसे कम उम्र की भारतीय महिला थी। उनकी इस बहादुरी के लिए उन्हें विश्व में कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। 
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डाक टिकट 
मित्रों नीरजा भनोट को भारत सरकार ने इस अदभुद वीरता और अदम्य साहस के लिए मरणोपरांत "अशोक चक्र" से सम्मानित किया गया जो कि भारत का सर्वोच्च शान्तिकालीन वीरता पुरस्कार है। अपनी वीरगति के समय नीरजा की उम्र महज 23 साल की ही थी। इस प्रकार वह यह पदक प्राप्त करने वाली प्रथम भारतीय महिला और सबसे काम आयु की महिला नागरिक बनीं। मित्रों पाकिस्तान की ओर से उन्हें "तमगा - ए - इन्सानियत" से नवाजा गया। वर्ष 2004 में उनके सम्मान में भारत सरकार ने एक डाक टिकेट भी जारी किया और अमेरिका ने वर्ष 2005 में उन्हें "जस्टिस फॉर क्राइम" पुरस्कार से सम्मानित किया। 

मित्रों इतना ही नहीं अपितु उनकी याद में एक संस्था "नीरजा भनोट पैन एम न्यास" की स्थापना भी हुई जो उनकी वीरता को स्मरण करते हुए महिलाओं को अदम्य साहस और वीरता हेतु पुरस्कृत करती है। उनके परिजनों द्वारा स्थापित यह संस्था प्रतिवर्ष दो पुरस्कार प्रदान करती है जिसमे से एक विमान कर्मचारियों को वैश्विक स्तर पर प्रदान किया जाता है, और दूसरा भारत में महिलाओं को विभिन्न प्रकार के अन्याय और अत्याचारों के विरुद्ध आवाज उठाने और संघर्ष के लिए प्रदान किया जाता है। प्रत्येक पुरस्कार की 1,50,000 धनराशि है और इसके साथ पुरस्कृत महिला को एक ट्रॉफी और स्मृतिपत्र भी प्रदान किया जाता है। 

Image result for neeraja bhanot                                                     "नीरजा भनोट के पुरस्कार"
                                                                                                       
1- अशोक चक्र  -  भारत 
2- फ्लाइट सेफ्टी फाउंडेशन हेरोइज़्म अवार्ड  -  यू एस ए  (U S A )  
3- जस्टिस फॉर क्राइम अवार्ड  -  यूनाइटेड स्टेट  (कोलम्बिया)
4- विशेष बहादुरी पुरस्कार  -  यूनाइटेड स्टेट ( जस्टिस विभाग)
5- तमगा - ए - इन्सानियत   -  पाकिस्तान 

                                                    "मित्रों त्याग और अदम्य साहस की इस महान प्रतिमूर्ति और भारत की इस वीर बेटी को अंकित त्रिपाठी की ओर से शत-शत नमन एवं भावपूर्ण श्रद्धांजलि.........!" 

                                                                                                                         धन्यवाद 
                                                                                                                   अंकित त्रिपाठी



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Sunday, 4 September 2016

हमारा देश हमारी संस्कृति



                                                                  "हिंदी या अंग्रेजी"


                           बहुत अजीब लगा उससे मिल कर फिर मैने सोंच कि क्या यही मेरे देश की संस्कृति है। 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ पर क्या वास्तविकता यही है 1947 से लेकर आज तक हम लोग आजादी का जश्न मनाते आ रहे है पर क्या वास्तव में हम स्वतंत्र है ? शायद नहीं.......! मित्रों अब सवाल यह उठता है कि क्यों नहीं, यह बात हम सभी को जानने की आवश्यकता है। 
  
                         मित्रों आज मैं "अंकित त्रिपाठी" आप सब से ऐसे विषय पर चर्चा करने जा रहा हूं जिसको आज हम भूलते जा रहे हैं, और वह है हमारी संस्कृति मित्रों हमारे देश में अंग्रेजी सरकार से पहले या यूं कहें कि जब हमारा देश अंग्रेजो से मुक्त था उस समय हमारे देश की संस्कृति क्या थी और जब अंग्रेजों ने ब्रिटिश शासन की स्थापना की अपने देश पर शासन किया और अन्दर ही अन्दर अपने देश को जिसे सोने की चिड़िया कहते थे उसे कमजोर बना दिया, और 15 अगस्त 1947 के बाद उन्होंने कहा कि हम जा तो रहे है पर अपनी छवि और अपनी संस्कृति यहीं पर छोड़ कर जा रहे है और आने वाले समय में इसी देश के लोग अपनी संस्कृति को छोड़ हमारी संस्कृति को अपनाएंगे। 

                                       
                               मित्रों वास्तविकता यही है कि आज हम उन्ही के बनाये नियमों को अपनाते है और अपने देश की राष्ट्र भाषा जिसे हम हिंदी कहते हैं उसे छोड़ कर अंग्रेजी भाषा का प्रयोग करते जा रहे हैं। हम लोग उन्ही की वेश भूषा, उन्हीं के खान पान, उन्हीं की तरह की जीवन शैली यहाँ तक उन्हीं के स्वाभाव को अपनाते जा रहे है। 
                
                                          मित्रों मुझे आज इस विषय पर चर्चा करने की धुन तब सवार हुई जब मै एक व्यक्ति से मिला जो की मुम्बई का रहने वाला था मित्रों आश्चर्य मुझे तब हुआ जब मैने उसे हिंदी में लिखने के लिए कहा उस व्यक्ति को हिन्ही भाषा का ज्ञान नहीं था सिर्फ हिंदी में बोलना या बात करना ही हिंदी भाषा का ज्ञान नहीं होता अपितु हमें हिंदी में सब कार्य करना आना चाहिये जैसे कि पढ़ना, लिखना, बोलना, और बात करना। मित्रों उस व्यक्ति ने मुझे बहुत ही प्रभावित किया और इस बात का आभास हुआ की किस तरह हम अपनी संस्कृति, अपने आदर्श, और अपने संस्कारों को भूलते जा रहे हैं। 
                    
                                      मित्रों हम लोग अंग्रेजों द्वारा बनाए गए नए वर्ष के प्रारम्भ की तिथि को उन्हीं के अनुसार मानते आ रहे हैं, और अपने नए सम्वत के प्रारम्भ की तिथि को भूल गए। मित्रों सिर्फ यही नहीं अपितु उन्हीं के बनाये गए त्योहारों को भी हम लोग अपना रहे है। मित्रों किसी भी देश का नागरिक चाहे वह अमेरिका का हो या इंग्लैंड का वे सिर्फ अपनी ही राष्ट्र भाषा का प्रयोग करते है कहे वो अपने घर में या अपने देश में हो यहाँ तक यदि वह दूसरे देश में भी जाता है तब भी वह अपनी ही राष्ट्र भाषा का प्रयोग करता है मित्रों अब सवाल यह उठता है की वह अपनी राष्ट्र भाषा का प्रयोग क्यों करता है मित्रों क्योंकि उन्हे अपनी राष्ट्र भाषा से प्रेम है पर क्या हम लोगों को है कदाचित नहीं !


          
                                 मित्रों मैं  ये नहीं कहता की अंग्रेजी भाषा के आप विपरीत जाएँ, अंग्रेजी सीखें पर उसे अपनी दिनचर्या न बनायें। मित्रों एक तरफ हम यह भी कहते है की हमें भारतीय होने पर और अपने देश पर गर्व है तो दूसरी तरफ अपने देश की राष्ट्र भाषा का मजाक भी उड़ाते है। 
                               
                               मित्रों हमारे देश के प्रधानमंत्री "श्री नरेंद्र मोदी " जी ने भी दूसरे देश में जा कर अपनी ही राष्ट्र भाषा हिंदी में ही भाषण दिए और अपने देश में भी वो हिंदी का ही प्रयोग करते है। मित्रों विख्यात कॉमेडियन "कपिल शर्मा" जिन्हें आप सभी जानते हैं उन्होंने भी हिंदी भाषा का ही समर्थन किया है देखिये इस विडियो में।


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मित्रों आज मैं  अंकित त्रिपाठी आप सब से सिर्फ इतना ही अनुरोध करना कहता हूँ कि अपने देश की संस्कृति को न भूलें और अपने देश की राष्ट्र भाषा हिंदी का ही प्रयोग करें। 

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                                                                        धन्यवाद........!



Friday, 2 September 2016

"जियो" जियो मेरे लाल

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                                       "मुकेश अम्बानी ने लॉंच किया अपना नया सिम "


मित्रों जैसा की आप सबको पता है कि मुकेश अम्बानी ने अपना नया सिम सिम लॉन्च किया है जिसका नाम जियो है। 

मित्रों देश भर में जियो की चर्चा तेज हो गई है। प्रतिस्पर्धी कम्पनियों में एक बेचैनी सी है, तो आइये मित्रों आज मै "अंकित त्रिपाठी" आप सब को बताता हूँ इस जिओ में खास क्या है। 

5 सितम्बर से देश में जियो की कॉमर्शियल सर्विस शुरू हो जाएगी। ये जियो का वेलकम ऑफर होगा जिसके तहत 31 दिसम्बर तक रिलायंस जिओ की वॉइस, डेटा और विडियो सेवाएं पूरी तरह से फ्री होंगी। 

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मित्रों रिलायंस इंडस्ट्रीज की 42वीं एजीएम में मुकेश अंबानी ने रिलायंस जियो को पीएम "श्री नरेन्द्र मोदी" के डिजिटल इंडिया विजन के लिए डेडिकेट किया। उन्‍होंने कहा कि जिओ का मतलब लाइव है। रिलायंस जियो के लॉन्च के बाद भारत की ग्लोबल रैंकिंग सुधरेगी और भारत टॉप 10 में इंटरनेट प्रोवाइडर में शामिल हो जाएगा।

मित्रों रिलायंस ने अपने एजीएम (एनुअल जनरल मीटिंग) के दौरान बहुत सी घोषडाये की, लेकिन सबकी नज़र टिकी थी जियो के आने वाले टैरिफ प्लान्स पर, तो चलिए हम आपको बताते है क्या है जियो के ट्ररीफ प्लान्स में जो इसे सभी कंपनियों से बड़ा और अलग बना रहा है।


ऊपर दिख रहे इस प्लान को हम आपको समझातें हैं मित्रों 1 जनवरी 2017 से जियो आपसे एक वाजिब रकम वसूलेगा, रिलायंस के लिए उनका जियो प्रोजेक्ट बहुत ही खास है और यह पूर्णतः भारतीयों को समर्पित है। जियो से पहले सभी कॉम्पनियों ने औसत स्पीड के डेटा के लिए आपसे बहुत रकम वसूली होगी, लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। 


जियो आपसे 1जीबी डेटा के लिए मात्र 50 रुपये का शुल्क लेगा, जो मौजूद कंपनियों के टैरिफ से 5 से 10 गुना सस्ता है। जियो डेटा के अलावा आपसे किसी भी सुविधा के पैसे नहीं लेगा। जियो के सभी डेटा प्लान्स में रात के वक़्त अनलिमिटेड 4जी डेटा की मुफ्त सुविधा उपलब्ध है।

हम आपको एक प्लान समझा देते है, बाकि आपको कहि समझ आ जायेगा। तो बात करतें है एम साइज पैक के बारे में इस पैक में 499 रुपये में आपको 4जीबी डेटा+अनलिमिटेड नाईट डेटा की सुविधा मिलती है, जिसमे आपको 28 दिनों की वैद्यता भी मिलती है। इस पैक में आपको अनलिमिटेड नेटिव एसएमएस मिलतें हैं, जो आप किसी भी भारतीय नंबर (लोकल व एसटीडी) पर कर सकतें हैं।


इसके अलावा मित्रों जियो ने अपने सबसे सस्ते टैरिफ प्लान्स में एक्स एक्स एक्स साइज का 19 रुपये का टैरिफ लांच किया है जिसके तहत आपको 100 एमबी डेटा+मुफ्त अनलिमिटेड नाईट 4जी डेटा की सुविधा मिलेगी, इस पैक में सभी सुविधाएं ऊपर वाले पैक की तरह ही होंगी, लेकिन इसकी वैद्यता 1 दिन की होगी।

मित्रों रिलायंस जियो के पास अभी मौजूद 25 लाख कस्टमर है और कंपनी नव वर्ष तक इसे 10 करोड़ लोगों तक बढ़ाना चाहती है, जियो के प्लान्स देख कर यह लक्ष्य बेहद ही आसान सा लगता है।

साथ कम्पनी ने LYF के फोन के साथ इस सिम में एक साल तक फ्री इन्टरनेट की सुविधा प्रदान करने की घोषड़ा भी की है इस फ़ोन को लेने के लिए यहाँ पर क्लिक करें http://fkrt.it/rYWIyNNNNN

"एक घटना और आत्मविश्वाश"

                                         एक व्यक्ति जिसने तोडा पहाड़ का गुरूर    




एक ऐसा व्यक्ति जिसने पूरी दुनिया को लोहे के चने चबाने पर मजबूर क्र दिया, जिसने असम्भव कार्य को भी सम्भव कर दिया, जिसने पूरी दुनियां को एक नया सन्देश दिया की जीवन में कोई भी कार्य असम्भव नहीं है यदि उसकी द्रढ़इच्छा मजबूत हो  तो.........!
मित्रों आज मैं एक ऐसे व्यक्ति के जीवन की सच्ची घटना सुनाने जा रहा हूं जिससे मुझे एक प्रेरड़ा प्राप्त हुई है। जी हाँ मित्रों आज मै "अंकित त्रिपाठी" आप सब के समक्ष ऐसी ही कहानी प्रस्तुत करने जा रहा हूं।
मित्रों घटना बिहार राज्य के छोटे से गाँव गहलौर में रहने वाले "दशरथ माँझी" की है।
दशरथ माँझी का जन्म 1934 में बिहार के गया में गहलौर नाम के गाँव में एक दलित परिवार में हुआ था। शुरुआती जीवन में उन्हें अपना छोटे से छोटा हक़ मांगने के लिए संघर्ष करना पडा।
वे जिस गाँव में रहते थे वहां से पास के कस्बे में जाने के लिए एक पूरा पहाड़ जिसका नाम "गहलौर पर्वत" था, पार करना पड़ता था। मित्रों दशरथ माँझी ने केवल एक हथौड़ा और छेनी लेकर अकेले ही 360 फुट लंबी, 30 फुट चौड़ी और 25 फुट ऊँचे पहाड़ को बीच से चीर
कर एक सड़क बना डाली और इस काम में उन्हें करीब 22 साल लग गए थे और इतने वर्षों के कठिन परिश्रम के बाद अन्ततः दशरथ जी के द्वारा बनाई सड़क ने अत्रि और वजीरगंज ब्लाक की दूरी को 55 कि. मी. से 15 कि. मी. कर दिया।
दशरथ माँझी का विवाह उन्ही के गाँव की रहने वाली एक लड़की से हुआ जिसका नाम फाल्गुनी देवी था।
मित्रों हर किसी के जीवन में कभी - कभी ऐसी घटनाएं होती हैं जिससे व्यक्ति को उसके जीवन में लक्ष्य प्राप्त करने की प्रेरणा प्रदान करती है और जिसके कारण व्यक्ति असम्भव कार्य को भी सम्भव कर देता है।
मित्रों दशरथ माँझी जी के जीवन में भी कुछ ऐसी ही घटना घटी थी जिससे प्रेरित होकर उन्होंने यह संकल्प लिया और उन्होंने असम्भव कार्य को संभव कर अपना संकल्प पूरा किया। दशरथ माँझी को गहलौर पहाड़ तोड़ कर रास्ता बनाने का जूनून तब सवार हुआ जब पहाड़ के दूसरे छोर पर लकड़ी काट रहे अपने पति के लिए     खाना ले जाने के क्रम में उनकी पत्नी फगुनी पहाड़ के दर्रे में गिर गई और उनका निधन हो गया उनकी पत्नी की मृत्यु दवाइयों और समय पर चिकित्सा केंद्र ना पहुँच पाने के अभाव में हुई क्योंकि चिकित्सा केंद्र दूर था और दवाइयां लेने भी बाजार जाना था जो कि नजदीक नहीं था। समय पर दवा नहीं मिल सकी यह बात उनके मन में घर कर गई, और इसके बाद दशरथ माँझी जी ने संकल्प लिया की वे अकेले दम पर पहाड़ के बीचो बीच से रास्ता निकालेगा और अत्रि वजीरगंज की दूरी को कम करेगा। अपनी पत्नी की मृत्यु के पश्चात उन्होंने 360 फुट लम्बा, 25 फुट गहरा और 30 फुट चौड़ा गहलौर की पहाड़ियों से रास्ता बनाने का फैसला किया।
मित्रों दशरथ माँझी जी का मज़ाक भी उड़ाया गया यहाँ तक लोग इनको पागल भी बोलने लगे थे किन्तु माँझी जी का कहना था कि  "लोग मुझे जितना पागल और मेरे कार्य का मजाक उड़ाते थे उतना मेरा निश्चय और भी ज्यादा मजबूत होता गया।" और उन्होंने अपने जीवन के 22 वर्ष (1960 से 1982) सिर्फ पहाड़ को तोड़ कर सड़क बनाने में बिता दिए और अंततः उन्हें विजय प्राप्त हुई।
मित्रों दशरथ माँझी की तरह ना जाने कितने ही ऐसे महान व्यक्ति हमारे देश में है जिन्होंने अपने कार्य से ना सिर्फ लोगों के दिलों को जीता अपितु समस्त नागरिकों को एक सन्देश भी दिया की यदि व्यक्ति चाहे तो वह हर कार्य क्र सकता है यदि कार्य द्रढसंकल्प से किया जाए।
मित्रों यह थी मेरी आज की कहानी आशा करता हूँ कि आप सब को पसंद आई होगी। 
                                                                                                                           
                                                                    धन्यवाद........!                                                                                                                                                                                                                                                                                                                     आपका मित्र                                                                                                                          अंकित त्रिपाठी 

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